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बढ़ती हैं फीस और बनती हैं अवैध सड़क विवादों के खज़ाना के नाम से प्रसिद्ध ग्रेस मिशन स्कूल , पुरानी जांचे भी चंद नोटों के चक्कर में गायब नई जांच भी इसी के दायरे में,अधिकारियों का दुस्साहस शासकीय भूमि पर सड़क बनाने की अनुमति बिछिया माईनर नहर का मामला

 बढ़ती हैं फीस और बनती हैं अवैध सड़क विवादों के खज़ाना के नाम से प्रसिद्ध ग्रेस मिशन स्कूल , पुरानी जांचे भी चंद नोटों के चक्कर में गायब नई जांच भी इसी के दायरे में,अधिकारियों का दुस्साहस शासकीय भूमि पर सड़क बनाने की अनुमति बिछिया माईनर नहर का मामला



ढीमरखेड़ा |  भारत में किसानों की मदद के लिए सरकार विभिन्न योजनाएँ संचालित करती है। इनमें से एक है नहरों के माध्यम से खेतों तक पानी पहुँचाने की योजना। इसी उद्देश्य से बड़ी नहरों को छोटी नहरों से जोड़कर जल आपूर्ति सुनिश्चित की जाती है। बिछिया माईनर नहर भी इसी योजना का हिस्सा है, जिससे आसपास के किसानों को सिंचाई के लिए पानी मिलता है। लेकिन हाल ही में ग्राम पकरिया में स्थित ग्रेस मिशन स्कूल द्वारा इस नहर की भूमि पर अवैध रूप से सड़क निर्माण किया जा रहा है।

*नियमों की अनदेखी*

नियमों के अनुसार, शासकीय भूमि पर किसी भी निजी संस्थान को निर्माण कार्य करने की अनुमति नहीं दी जा सकती, जब तक कि उच्चाधिकारियों से स्पष्ट स्वीकृति प्राप्त न हो। बावजूद इसके, कार्यपालन यंत्री नर्मदा विकास संभाग क्र-4, सिहोरा, जिला जबलपुर के द्वारा स्कूल को सड़क निर्माण की अनुमति दी गई। यह मामला तब प्रकाश में आया जब स्थानीय लोगों ने शिकायत दर्ज कराई और जांच के दौरान यह स्पष्ट हुआ कि यह अनुमति नियम विरुद्ध दी गई है।

*प्रशासनिक लापरवाही और संदेहास्पद अनुमति*

ग्रेस मिशन पब्लिक स्कूल ने 21 मार्च 2024 को कार्यपालन यंत्री को पत्र लिखकर सड़क निर्माण की अनुमति मांगी थी। केवल छह दिनों के भीतर, 27 मार्च 2024 को बिना किसी उच्चाधिकारियों को सूचित किए, कार्यपालन यंत्री अनिल तिवारी ने सड़क निर्माण की अनुमति दे दी। किन नियमों के तहत निजी संस्थान को अनुमति दी गई? क्या उच्च अधिकारियों से इस अनुमति को लेकर कोई चर्चा की गई थी? क्या यह निजी संस्था को लाभ पहुँचाने के उद्देश्य से किया गया भ्रष्टाचार नहीं है? क्या इस सड़क निर्माण से नहर की जल आपूर्ति प्रभावित होगी?

*किसानों के लिए खतरा*

इस सड़क निर्माण से नहर का मूल स्वरूप बदल गया है, जिससे जल प्रवाह पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है। नहर के अस्तित्व पर खतरा मंडरा रहा है और भविष्य में इससे किसानों को पानी की आपूर्ति में समस्या आ सकती है। सरकारी योजनाओं के तहत बनी नहरें कृषि के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण होती हैं, लेकिन इस तरह के अवैध निर्माण कार्य उनकी उपयोगिता को प्रभावित कर सकते हैं।

*प्रशासन का टाल-मटोल रवैया*

जब कार्यपालन यंत्री अनिल तिवारी से इस संदर्भ में सवाल किए गए, तो उन्होंने कहा, "कार्यालय जाकर ही इस संबंध में कुछ बता पाऊंगा। मुझे इस संबंध में जानकारी नहीं है।" उनका यह बयान आश्चर्यजनक है क्योंकि उन्होंने खुद ही इस अनुमति को स्वीकृति दी थी।

*संभावित भ्रष्टाचार और प्रशासनिक लापरवाही*

यह मामला केवल एक अवैध निर्माण का नहीं, बल्कि प्रशासनिक लापरवाही और भ्रष्टाचार का भी संकेत देता है। नर्मदा विकास संभाग के वरिष्ठ अधिकारियों को इस मामले की निष्पक्ष जांच करनी चाहिए और यदि नियमों का उल्लंघन हुआ है, तो कार्यपालन यंत्री सहित अन्य संबंधित अधिकारियों पर सख्त कार्रवाई की जानी चाहिए।

*ग्रामीणों की प्रतिक्रिया*

ग्राम पकरिया के स्थानीय निवासियों ने इस सड़क निर्माण पर आपत्ति जताई है। उन्होंने कहा कि यह निर्माण केवल स्कूल प्रबंधन के निजी हित के लिए किया जा रहा है, न कि ग्रामीणों की सुविधा के लिए। यदि यह कार्य जारी रहता है, तो वे इसे रोकने के लिए प्रशासन से गुहार लगाने के साथ-साथ विरोध प्रदर्शन भी करेंगे।इस प्रकरण में स्पष्ट रूप से सरकारी नियमों की अनदेखी की गई है। एक निजी संस्थान को लाभ पहुँचाने के लिए शासकीय भूमि पर निर्माण कार्य की अनुमति दी गई है। यह प्रशासनिक भ्रष्टाचार और लापरवाही का मामला है, जिसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। आवश्यक है कि इस पूरे मामले की निष्पक्ष जांच की जाए। अवैध रूप से दी गई अनुमति को रद्द किया जाए। कार्यपालन यंत्री और अन्य संबंधित अधिकारियों पर सख्त कार्रवाई की जाए। नहर की जल आपूर्ति को संरक्षित रखा जाए ताकि किसानों को कोई नुकसान न हो। यदि समय रहते इस पर ध्यान नहीं दिया गया, तो यह अन्य निजी संस्थानों के लिए भी एक गलत उदाहरण बनेगा, जिससे सरकारी संपत्तियों पर कब्जा करने की प्रवृत्ति को बढ़ावा मिलेगा।

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