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रोटी के लिए इस दुनियां में मजदूरों के तन बिक जाते हैं, मजदूरों के तन का जिक्र ही क्या मुर्दों के कफ़न बिक जाते हैं

 रोटी के लिए इस दुनियां में मजदूरों के तन बिक जाते हैं, मजदूरों के तन का जिक्र ही क्या मुर्दों के कफ़न बिक जाते हैं।

रोटी की कीमत क्या होती है,उस गरीब मज़दूर से पूछो,जो दिन भर पसीना बहाता है,तब जाकर उसके घर चूल्हा जल पाता है।



ढीमरखेड़ा | गरीबी में जन्मा ,गरीब माँ के आंचल में पला,भूखी माँ के आंचल में जिसने अपना पेट भरा,माँ के त्याग को जिसने गोदी में ही जान लिया,रोटी की कीमत को जिसने बचपन में ही भांप लिया,गिर रही हैं आज बूंदें कपाल से उसके टपटप,भीग रहे हैं तन पसीने से लथपथ,भरी दोपहरी में जलता है तन,स्वेद की हर बूंद को महसूस करता है मन,ठंडी हवाओं से रक्त उसका जम जाता,बारिश के कीचड़ में पांव उसका धंस जाता,आंधी तूफानों में भी निरंतर वह चलता रहता,सर पर ज़िम्मेदारी का बोझ उठाता रहता, नहीं थकता कभी नहीं रुकता कभी, कठिनाइयों से हरदम रहता जूझता,रोज़ी की तलाश में जुटा रहता,नित्य ही कर्तव्य पथ पर बढ़ता रहता,जी हाँ यह मजदूर है जिसका जीवन कब तक है उससे वह अन्जान है,नहीं जानता कब किसी पुल के नीचे दब जायेगा, कब किसी इमारत से गिर जायेगा, या कब कंपनी के प्रदूषण से मर जायेगा, जानता है तो सिर्फ दो वक़्त की रोटी, एक मजदूर दो वक़्त की रोटी कमाने के लिये, किसी चौराहे पर खड़ा सोचता है, कि काश कुछ काम मिल जाये, माँ का ख्याल जब आता है, तन से पसीना छूट जाता है,रोटी के बिन जिस भूखी माँ ने,दूध पिलाया अब वह बूढ़ी हो चली,यदि उसे भूखी ही सुलाउंगा तो,अपने आंसुओं को कैसे छुपाउंगा,अपना कर्तव्य कैसे निभाउंगा और,माँ के दूध का क़र्ज़ कैसे चुकाउंगा,भोजन बरबाद करने वालों

रोटी की कीमत क्या होती है,उस गरीब मज़दूर से पूछो,जो दिन भर पसीना बहाता है,तब जाकर उसके घर चूल्हा जल पाता है।

दैनिक ताजा ख़बर प्रधान संपादक, कवि, लेखक राहुल पाण्डेय



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