सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

ढीमरखेड़ा थाने में प्रधान आरक्षक के पद में पदस्थ कृष्णदत्त परौहा का शुगर के चलते हुआ निधन, ढीमरखेड़ा स्टॉप और रिश्तेदारों में शोक की लहर, नम आंखों से ग्रहग्राम दरौली में किया गया अंतिम संस्कार

 ढीमरखेड़ा थाने में प्रधान आरक्षक के पद में पदस्थ कृष्णदत्त परौहा का शुगर के चलते हुआ निधन, ढीमरखेड़ा स्टॉप और रिश्तेदारों में शोक की लहर, नम आंखों से ग्रहग्राम दरौली में किया गया अंतिम संस्कार



ढीमरखेड़ा | कृष्णदत्त परौहा, जिनकी उम्र 58 वर्ष थी, एक अत्यंत कर्मठ और समर्पित प्रधान आरक्षक के पद में पदस्थ पुलिस कर्मचारी थे, जो ढीमरखेड़ा थाने में प्रधान आरक्षक के पद पर कार्यरत थे। उनके निधन ने न केवल उनके परिवार को शोकाकुल किया, बल्कि उनके साथी पुलिसकर्मियों और पूरे समुदाय में भी शोक की लहर दौड़ा दी। कुछ समय से वे गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं से जूझ रहे थे, विशेष रूप से शुगर (मधुमेह) की बीमारी से। उनकी तबीयत लगातार बिगड़ रही थी, और अंततः 58 वर्ष की आयु में उनका निधन हो गया। कृष्णदत्त परौहा का जन्म एक साधारण परिवार में हुआ था, लेकिन उनके जीवन में अनुशासन और कर्तव्यपरायणता की भावना बचपन से ही थी। उन्होंने अपने जीवन में समाज सेवा और अपने कार्यों के प्रति जिम्मेदारी का महत्व समझा, जिसके कारण उन्होंने पुलिस विभाग में अपना करियर चुना। ढीमरखेड़ा थाने में प्रधान आरक्षक के रूप में उनका कार्यकाल बहुत ही अनुकरणीय रहा। अपने कर्तव्यों का पालन करते हुए उन्होंने कानून व्यवस्था बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उनकी ईमानदारी, धैर्य और कर्तव्यपरायणता के चलते वे अपने सहयोगियों और उच्च अधिकारियों के बीच बेहद सम्मानित थे। वे न केवल एक अच्छे कर्मचारी थे, बल्कि उनके साथ काम करने वाले लोगों के लिए एक प्रेरणा भी थे। उनकी सरलता और लोगों के साथ मधुर संबंधों ने उन्हें ढीमरखेड़ा और आसपास के क्षेत्रों में लोकप्रिय बना दिया था। कृष्णदत्त परौहा का स्वास्थ्य कुछ समय से ठीक नहीं था। शुगर की बीमारी ने उनके शरीर को धीरे-धीरे कमजोर कर दिया था। मधुमेह एक ऐसी बीमारी है जो शरीर के विभिन्न अंगों पर प्रभाव डालती है, और अगर इसका सही समय पर इलाज न हो, तो यह गंभीर रूप से प्रभावित कर सकती है। कृष्णदत्त जी भी इस बीमारी के प्रभाव से मुक्त नहीं हो सके। हालाँकि, उन्होंने अपनी बीमारी के बावजूद कभी भी अपने कर्तव्यों से पीछे नहीं हटे। वे अपने काम के प्रति इतने समर्पित थे कि बीमारी के बावजूद उन्होंने पूरी कोशिश की कि उनके कार्यों में कोई बाधा न आए। लेकिन अंततः उनकी स्थिति इतनी गंभीर हो गई कि उन्हें अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा। चिकित्सकों द्वारा उन्हें उचित देखभाल और उपचार प्रदान किया गया, परंतु उनकी स्थिति में सुधार नहीं हो सका।

*नम आंखों से ग्रहग्राम में किया गया अंतिम संस्कार*

कृष्णदत्त परौहा का निधन उनके परिवार और उनके सहयोगियों के लिए एक बहुत बड़ा आघात था। उनके निधन की खबर से पूरे पुलिस विभाग में शोक की लहर दौड़ गई। उनके सहयोगियों और उच्च अधिकारियों ने उनके योगदान को याद करते हुए उन्हें श्रद्धांजलि दी।उनका अंतिम संस्कार उनके पैतृक गाँव दरौली में संपन्न हुआ। अंतिम संस्कार में ढीमरखेड़ा थाने के पुलिसकर्मी, उनके साथी, उनके रिश्तेदार और गाँव के लोग बड़ी संख्या में उपस्थित थे। सभी ने नम आँखों से उन्हें अंतिम विदाई दी। इस दुःखद घड़ी में उनके परिवार के सदस्यों के साथ-साथ ढीमरखेड़ा पुलिस विभाग के सभी कर्मचारी उनके दुख में सहभागी बने। कृष्णदत्त परौहा के परिवार में उनकी पत्नी, बेटे और बेटी हैं। उनका परिवार उनके निधन से पूरी तरह से टूट चुका है। उनके बेटे भी अपने पिता के नक्शेकदम पर चल रहे हैं, और पुलिस विभाग में शामिल होने का सपना देख रहे हैं ताकि वे अपने पिता की तरह समाज की सेवा कर सकें।

*परिवार और रिश्तेदारों में टूटा दुःख का पहाड़*

कृष्णदत्त परौहा के निधन के बाद, उनके परिवार को रिश्तेदारों और ढीमरखेड़ा पुलिस स्टाफ से बहुत समर्थन मिला। उनके घर पर रिश्तेदारों का तांता लगा रहा, और सभी ने परिवार को सांत्वना देने का प्रयास किया। उनकी पत्नी और बच्चों के लिए यह समय बहुत ही कठिन था, लेकिन रिश्तेदारों और दोस्तों ने उन्हें इस दुःख की घड़ी में सहारा दिया।ढीमरखेड़ा पुलिस स्टाफ भी इस दुःख की घड़ी में परिवार के साथ खड़ा रहा। उनके साथी पुलिसकर्मी न केवल अंतिम संस्कार में उपस्थित थे, बल्कि उन्होंने परिवार को हर संभव मदद का आश्वासन भी दिया।

*शुगर की बीमारी के चलते हों रही मौत*

शुगर या मधुमेह एक गंभीर बीमारी है, जिसका प्रभाव शरीर के कई अंगों पर पड़ता है। यह बीमारी तब होती है जब शरीर में ग्लूकोज का स्तर असामान्य रूप से बढ़ जाता है। यदि इसका सही समय पर इलाज न हो, तो यह दिल, किडनी, आँखों और अन्य अंगों को गंभीर रूप से प्रभावित कर सकती है।कृष्णदत्त परौहा भी इस बीमारी से पीड़ित थे। मधुमेह के चलते उनके शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली कमजोर हो गई थी, जिसके कारण वे अन्य बीमारियों के प्रति अधिक संवेदनशील हो गए थे। हालाँकि उन्होंने अपनी बीमारी को अपने कर्तव्यों के बीच कभी नहीं आने दिया, लेकिन अंततः उनकी बीमारी ने उनके जीवन को प्रभावित किया। मधुमेह से पीड़ित लोगों को अपने स्वास्थ्य का विशेष ध्यान रखना चाहिए। नियमित रूप से शुगर लेवल की जांच करानी चाहिए, स्वस्थ आहार लेना चाहिए, और चिकित्सक की सलाह के अनुसार दवाइयाँ लेनी चाहिए। यदि मधुमेह का सही समय पर इलाज न हो, तो यह जानलेवा साबित हो सकता है, जैसा कि कृष्णदत्त परौहा के मामले में हुआ।

*समाज और पुलिस विभाग में शोक*

कृष्णदत्त परौहा के निधन से पूरे ढीमरखेड़ा क्षेत्र में शोक की लहर दौड़ गई। उनके निधन के बाद, समाज के विभिन्न वर्गों के लोगों ने उनके परिवार के प्रति अपनी संवेदनाएँ व्यक्त कीं। उनकी ईमानदारी और कर्तव्यनिष्ठा के कारण उन्हें हमेशा याद किया जाएगा।पुलिस विभाग में उनके योगदान को कभी भुलाया नहीं जा सकेगा। उनके साथी पुलिसकर्मी और अधिकारी उनके कार्यों और समर्पण को हमेशा याद रखेंगे। उन्होंने जिस तरह से अपने कर्तव्यों का पालन किया, वह अन्य पुलिसकर्मियों के लिए प्रेरणास्त्रोत रहेगा।

टिप्पणियाँ

popular post

नहर में बैठा यमराज छोटे - छोटे बच्चों को बना रहा शिकार, नहर ले रही बली नर्मदा नहर उमरियापान में डूबी बच्चियां, दो की मौत, अन्य की तलाश जारी

 नहर में बैठा यमराज छोटे - छोटे बच्चों को बना रहा शिकार, नहर ले रही बली नर्मदा नहर उमरियापान में डूबी बच्चियां, दो की मौत, अन्य की तलाश जारी ढीमरखेड़ा |  उमरियापान के समीप नर्मदा नहर में तीन बच्चियों के डूबने की दर्दनाक घटना ने पूरे क्षेत्र को झकझोर कर रख दिया है। इस घटना में दो बच्चियों की मौत हो चुकी है, जबकि तीसरी बच्ची की तलाश जारी है। यह हादसा रविवार की सुबह हुआ जब तीनों बच्चियां नहर में नहाने गई थीं। मृतक बच्चियों की पहचान सिद्धि पटेल (12 वर्ष, कक्षा आठवीं) एवं अंशिका पटेल (14 वर्ष, कक्षा नवमी) के रूप में हुई है, जबकि सिद्धि की छोटी बहन मानवी पटेल (8 वर्ष) अब भी लापता है। इस हृदयविदारक घटना के बाद गांव में मातम पसर गया है। पूरे क्षेत्र में शोक की लहर दौड़ गई है, और प्रशासनिक अमला लगातार तीसरी बच्ची की तलाश में जुटा हुआ है।रविवार की सुबह परसवारा गांव की तीन बच्चियां उमरियापान के समीप नर्मदा नहर में नहाने के लिए गई थीं। नहर का पानी गहरा होने के कारण तीनों बच्चियां उसमें डूबने लगीं। आस-पास कोई मौजूद नहीं था, जिससे उन्हें तुरंत बचाया नहीं जा सका। कुछ देर बाद जब स्थानीय लोगों...

सिलौड़ी मंडल अध्यक्ष मनीष बागरी, दोस्ती की मिसाल, जिसने बचाई सौरभ मिश्रा की जान, मुंबई में आया सौरभ मिश्रा को अटैक अब हैं सुरक्षित, तुझे कैसे कुछ हों सकता हैं मेरे भाई तेरे ऊपर करोड़ो लोगो की दुआएं हैं काल भी उसका क्या बिगाड़े जिसकी रक्षा महाकाल करते हों

 सिलौड़ी मंडल अध्यक्ष मनीष बागरी, दोस्ती की मिसाल, जिसने बचाई सौरभ मिश्रा की जान, मुंबई में आया सौरभ मिश्रा को अटैक अब हैं सुरक्षित, तुझे कैसे कुछ हों सकता हैं मेरे भाई तेरे ऊपर करोड़ो लोगो की दुआएं हैं काल भी उसका क्या बिगाड़े जिसकी रक्षा महाकाल करते हों  ढीमरखेड़ा |  मुंबई जैसे बड़े महानगर में जीवन हमेशा व्यस्त और तेज़ गति से चलता है, लेकिन इसी बीच एक घटना घटी जिसने यह साबित कर दिया कि सच्ची दोस्ती किसी भी परिस्थिति में अपने दोस्त के लिए हर हद पार कर सकती है। सिलौड़ी मंडल अध्यक्ष मनीष बागरी ने अपने दोस्त सौरभ मिश्रा के लिए जो किया, वह न सिर्फ दोस्ती की मिसाल बन गया, बल्कि यह भी दिखाया कि इंसानियत और प्रेम से बड़ा कुछ भी नहीं। सौरभ मिश्रा मुंबई में थे, जब अचानक उनकी तबीयत बिगड़ गई। बताया जाता है कि उन्हें गंभीर स्वास्थ्य समस्या का सामना करना पड़ा, जिससे उनकी जान पर खतरा बन गया था। जैसे ही यह खबर सिलौड़ी मंडल अध्यक्ष मनीष बागरी तक पहुंची, उन्होंने बिना किसी देरी के मुंबई जाने का फैसला किया। वह तुरंत हवाई जहाज से मुंबई रवाना हो गए, क्योंकि उनके लिए उनका दोस्त सबसे महत्वपूर...

पुलिस विभाग के बब्बर शेर, सहायक उप निरीक्षक अवध भूषण दुबे का गौरवशाली पुलिस जीवन, 31 मार्च को ढीमरखेड़ा थाने से होगे सेवानिवृत्त, सेवानिवृत्त की जानकारी सुनके आंखे हुई नम

 पुलिस विभाग के बब्बर शेर, सहायक उप निरीक्षक अवध भूषण दुबे का गौरवशाली पुलिस जीवन, 31 मार्च को ढीमरखेड़ा थाने से होगे सेवानिवृत्त,  सेवानिवृत्त की जानकारी सुनके आंखे हुई नम  ढीमरखेड़ा |   "सच्चे प्रहरी, अडिग संकल्प, निर्भीक कर्म" इन शब्दों को अगर किसी एक व्यक्ति पर लागू किया जाए, तो वह हैं अवध भूषण दुबे। अपराध की दुनिया में जिनका नाम सुनते ही अपराधियों के दिल कांप उठते थे, आम जनता जिन्हें एक रक्षक के रूप में देखती थी, और जिनकी उपस्थिति मात्र से ही लोग सुरक्षित महसूस करते थे ऐसे थे ढीमरखेड़ा थाने के सहायक उप निरीक्षक अवध भूषण दुबे। 01 मार्च 1982 को जब उन्होंने मध्य प्रदेश पुलिस की सेवा में कदम रखा था, तब किसी ने नहीं सोचा था कि यह व्यक्ति आने वाले चार दशकों तक अपने साहस, कर्तव्यपरायणता और निडरता के लिए बब्बर शेर के नाम से जाना जाएगा। 43 वर्षों से अधिक की सेवा के बाद, 31 मार्च 2025 को वे ढीमरखेड़ा थाने से सेवानिवृत्त हो रहे हैं, लेकिन उनके किए गए कार्य और उनकी यादें हमेशा लोगों के दिलों में जीवित रहेंगी। *अपराधियों के लिए काल "बब्बर शेर"* अपराध की दुनिया में कुछ प...