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लोकतंत्र नहीं वरन भाषा के स्तर पर तानाशाही हैं, निर्दोष जा रहे भाषा के आधार पर जेल

 लोकतंत्र नहीं वरन भाषा के स्तर पर तानाशाही हैं, निर्दोष जा रहे भाषा के आधार पर जेल 



ढीमरखेड़ा | एक जनहित याचिका पर विचार करते हुए भारत के प्रधान न्यायाधीश जस्टिस टीएस ठाकुर की अध्यक्षता वाली एक तीन सदस्यीय खंडपीठ ने स्पष्ट कर दिया है कि सुप्रीम कोर्ट की भाषा अंग्रेजी ही है और इसकी जगह हिन्दी को लाने के लिए वह केंद्र सरकार या संसद को कानून बनाने के लिए नहीं कह सकता क्योंकि ऐसा करना विधायिका और कार्यपालिका के अधिकारक्षेत्र में दखल देना होगा । हिन्दी और अन्य भारतीय भाषाओं के हिमायती बहुत समय से यह मांग उठाते आ रहे हैं कि अदालतों के कामकाज की भाषा ऐसी हो जिसे आम आदमी भी समझ सके और वह हर बात के लिए वकीलों पर निर्भर न रहे । अक्सर ऐसा होता है कि मुवक्किल को यह भी पता नहीं चल पाता कि उसका वकील उसका पक्ष रखने के लिए अदालत के सामने क्या दलीलें रख रहा है। इसलिए भारतीय भाषाओं के इन हिमायतियों की यह मांग है कि एक आजाद और लोकतांत्रिक देश में अदालती कामकाज की भाषा विदेशी अंग्रेजी न होकर देशी हिन्दी और अन्य भाषाएं हों। इसके साथ ही यह भी सही है कि इस मांग का असली मकसद यही है कि अंग्रेजी को हटा कर हिन्दी को अदालती कामकाज की भाषा बनाया जाए।

*क्या है अदालत की भाषा*

सुप्रीम कोर्ट ने अपना आदेश संविधान में की गई व्यवस्था के अनुरूप दिया है,

आजादी के बाद हिन्दी के सबसे बड़े हिमायती जनसंघ और समाजवादी आंदोलन से जुड़े नेता रहे हैं। 1967 में चले जबर्दस्त अंग्रेजी हटाओ आंदोलन के पीछे भी जनसंघ और राममनोहर लोहिया के अनुयायी समाजवादी ही सबसे बड़ी शक्ति थे। इस समय केंद्र में जनसंघ के नए अवतार भारतीय जनता पार्टी की सरकार है, जिसके गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने कुछ समय पहले हिन्दी को संयुक्त राष्ट्र की भाषा बनाने की मांग की थी। लेकिन दिलचस्प बात यह है कि बीजेपी की सरकार भी सुप्रीम कोर्ट के कामकाज की भाषा हिन्दी करने के लिए संसद में नया कानून पारित कराने के लिए तैयार नहीं है। जनवरी 2015 में केंद्रीय गृह मंत्रालय ने सुप्रीम कोर्ट में एक हलफनामा दाखिल करके इस प्रस्ताव को खारिज कर दिया था कि संविधान में संशोधन करके हिन्दी को सुप्रीम कोर्ट एवं सभी 24 हाईकोर्टों के कामकाज की भाषा बनाया जाए क्योंकि अंग्रेजी भारत पर ब्रिटेन के औपनिवेशिक शासन की विरासत है और अब उसे हटा दिया जाना चाहिए। यह हलफनामा उसी जनहित याचिका के जवाब में दाखिल किया गया था, जिसे अब सुप्रीम कोर्ट ने खारिज किया है।

*हिन्दी क्यों नहीं*

केंद्रीय गृह मंत्रालय का हलफनामा 2008 में विधि आयोग द्वारा तैयार की गई रिपोर्ट पर आधारित था जिसमें आयोग ने विचार व्यक्त किया था कि सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्टों में हिन्दी का इस्तेमाल अनिवार्य करने का प्रस्ताव व्यावहारिक नहीं है और लोगों के किसी भी हिस्से पर कोई भी भाषा जबर्दस्ती नहीं लादी जा सकती। हाईकोर्ट के न्यायाधीशों का अक्सर एक राज्य से दूसरे राज्य में तबादला होता रहता है, इसलिए उनके लिए यह संभव नहीं है कि वे अपने न्यायिक कर्तव्यों को अलग-अलग भाषाओं में पूरा कर सकें। दूसरे, भाषा का सवाल बेहद संवेदनशील और भावना से जुड़ा सवाल है और इस पर अतीत में आंदोलन होते रहे हैं। इसलिए वर्तमान व्यवस्था को बदलना तर्कसंगत नहीं होगा। यह सही है कि अंग्रेजी ब्रिटिश शासन की विरासत है लेकिन इसके साथ ही यह भी सही है कि पिछली दो सदियों से यह अखिल भारतीय प्रशासन और न्यायिक व्यवस्था की भाषा बनी हुई है। भारत जैसे बहुभाषी देश में सरकारी और अदालती कामकाज की एक भाषा का होना बहुत जरूरी है। यूं भी अब अंग्रेजी उतनी विदेशी नहीं रह गई है जितनी वह कभी हुआ करती थी। वह अरुणाचल प्रदेश, सिक्किम और नगालैंड जैसे कई राज्यों और केंद्रशासित क्षेत्रों की सरकारी भाषा है और केंद्रीय साहित्य अकादमी द्वारा स्वीकृत भाषाओं में भी शामिल है। आज भी ज्ञान-विज्ञान की भाषा के रूप में हिन्दी समेत कोई भी भारतीय भाषा उसके समकक्ष नहीं आ सकी है। इसलिए आश्चर्य नहीं कि वह भारत में सरकारी और अदालती कामकाज की भाषा बनी हुई है।

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