विवेचना व्यवस्था, न्याय की रीढ़ या भ्रष्ट तंत्र का हथियार कटनी | किसी भी लोकतांत्रिक राष्ट्र की न्याय व्यवस्था केवल अदालतों की चारदीवारी तक सीमित नहीं होती, बल्कि उसकी वास्तविक ताकत उस विवेचना व्यवस्था में छिपी होती है जो अपराध के पीछे का सच सामने लाने का काम करती है।अदालत वही निर्णय देती है जो तथ्य और सबूत उसके सामने प्रस्तुत किए जाते हैं। यदि विवेचना निष्पक्ष, ईमानदार और सत्य आधारित हो तो न्याय व्यवस्था मजबूत होती है, लेकिन यदि जांच भ्रष्टाचार, दबाव और चापलूसी की भेंट चढ़ जाए तो न्याय केवल कागजों तक सीमित रह जाता है। आज देश में आम जनता के बीच यह धारणा तेजी से मजबूत हुई है कि कई मामलों में विवेचना सत्य की खोज के लिए नहीं, बल्कि प्रभावशाली लोगों को बचाने और कमजोर वर्ग को दबाने के लिए की जाती है। पैसों के बल पर जांच की दिशा बदल देना, राजनीतिक दबाव में केस कमजोर करना, सबूत गायब करना और अपराधियों को बचाने के लिए कागजों में कहानी बदल देना यह सब न्याय व्यवस्था पर सबसे बड़ा सवाल खड़ा करता है। जब विवेचक सत्ता के सामने झुकने लगे और सत्य की जगह जी-हजूरी को प्राथमिकता देने लगे, ...